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नमस्कार दोस्तों, आज मैं आपको सामने वाली आंटी की चुदाई की सुहानी कथा सुनाने जा रहा हूँ जिसका आप खूब आनंद उठाएँगे | आंटी का नाम तो ख़ैर मैं भी नहीं जाता क्यूंकि दोस्तों असल में तालुकात भी तो उनकी पिलपिली चुत से जोड़े थे | आंटी मुझसे दिखने में काफी सरीफ लगती थीं इसीलिए मैं हमेशा उन्हें सूर से देखकर ही घर में अकेले में हस्थमैथुन कर कर शांत हो जाया करता था | एक दिन के वाकया ने पर मेरी पुरी सोच को बदल दिया और मुझे यह भी बतला दिया की मैं आंटी की चुत को मार सकता हूँ क्यूँ असल में वो भी एक होती तो नारी ही हैऔर लंड की प्यास की वो भी मेहरबान होती है |

एक दिन आंटी मेरे घर आयीं और कहने लगी की उनके पति घर में ताला लगाकर किसी काम से बहार गए हुए हैं इसीलिए वो कुछ देर मेरे घेर पर ठेरना चाहती है और मैं भी भला दोस्तों इतने अच्छे मौके पर उन्हें कैसे मना कर सकता था | वहां कुछ देर हुए की मैंने आंटी को चाय बनाकर दी जो गलती से आंटी के उप्पर ही गिर गयी और आंटी के कपड़े भी गंदे हो चलें | मैंने भी शराफत धिकाते हुए अपनी माँ के कुछ कपड़े आंटी को पहने के लिए और आंटी मैं कपड़े बाथरूम में बदलने लगी | उस वक्त मेरे घर किस्मत से कोई नहीं था और माप में तो मेरी माँ आंटी से कहीं गुना पतली भी थी | अब आंटी को मेऋ माँ के कपड़े बड़े ही भिन्च्के आने लगे इसीलिए आंटी ने अचानक बातरूम में से ही मुझसे आवाज़ लगई |

मैं फटाफट आंटी के पास गया तो मैंने आंटी की नंगी कमर को देखा जिससे मेरा लंड बिलकुल सख्ती में आ गया | आंटी ने मुझे अपनी समस्या बतलाई और मुझे अपनी माँ कपड़े पहनाने में कुछ हाथ बंटाने को कहने लगी | मैंने भी जब हामी भरी तो आंटी ने पहले अपनी नंगी पीठ को मेरे सामने किया और ब्रा का हुक लगाने को कहा जिसपर दांग रह गया | मैं पहले से हुआ पूरा तना हुआ था और मेरे हाथ उनके ब्रा का हुक लगते हुए कांपने लगे | अचानक से उनका बार खुलकर नीचे गिर गुआ और आंटी डर के मारे मेरी तरफ ब्रा क उठाते हुए झुक पड़ी | जब आंटी ने उप्पर उठकर देखा तो दंग रह गयी क्यूंकि मैं उनके चुचों गन्दी नज़रों चुनकर देख रहा था |

आब इससे पहले आंटी कुछ और सोचती या करती मैंने आंटी के चुचों को अपने हाथों में ले लिया और चूसने लगा | आंटी भी गरम हो गयी और मुझसे लिपटकर मेरी गर्दन को चूमकर अपने चुचों को दबवाने का मज़ा लुट रही थीं | मैं आंटी के चुचों को चूसते हुए उनके होठों को भी अपने होठों के तले कैद कर लिया | मेरी उँगलियाँ अब उनकी पैंटी की तरफ पहुंची और मैंने आंटी की पैंटी को भी उतार दिया | कुछ ही देर में अब आंटी की चुत में ऊँगली कर रहा था और आंटी भारी सिसकियाँ ले रही थी | मैंने कुछ देर उनकी चाटी ही होगी के अंत नीचे झुक वहीँ नीचे फ़र्ज़ पर लेट गयी |

आंटी ने अपनी दोनों टांगों को फैला लिया जिसपर अब मैंने भी अपनी पैंट को उतार दिया ओरके उप्पर अपने लेट को लेकर चड गया | मैं उनके उप्पर चदते उनकी पिलपिली चुत में अपने लंड को देखने लगा और साथ उनके चुचों को भी कसकर भींचने लगा | आंटी को बहुत मज़ा आ रहा था और मैंने उनकी जमकर किसी जंगली कुत्ते की तरह चुदाई कर रहा था | मैंने उसकी चुत लगभग आधे घंटे तक अपने बाथरूम में लिटाकर चोदी जिसके बाद मैं उनके उप्पर ही झड गया | अब हम दोनों के चेरे पर संतुष्ठी का भाव सा आ गया और उस कांड के बाद अब जब आंटी अपने आप को अकेला पाती तो मुझे अपनी पिलपिली चुत को ठुकवाने के लिए बुला लेती |

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