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मेरी सैक्सी अम्मी को चाचा ने चोदा रंडी की तरहे 13331164_1625187657797975_981182637657369288_n

मेरा नाम मलाज है। मैं आपको एक सच्ची घटना बताने जा रहा हूँ।
यह बात उस समय की है जब मैं करीब 10-12 साल का था मैं अक्सर अपने चाचाजान के साथ ही रहता था। चाचा मुझे अपने साथ ही सुलाते थे। फिर अम्मी मुझे देर रात चाचा के पास से लेकर अपने पास सुलाती थी।
मैं अक्सर महसूस करता था कि जब अम्मी मुझे लेने आती थी तो कभी कभार मैं जाग जाता था तो लगता था कि चारपाई हिल रही है लेकिन मेरी समझ में कुछ भी नहीं आता था और कुछ देर बाद ही अम्मी मुझे लेकर अपने बिस्तर पर आ जाती थी
खैर यह सब चलता रहा। मैं कभी कभार दिन में भी देखता था कि चचाजान अम्मी की ओर कुछ इशारा करते तो कभी तो वो चाचा के साथ भूसे वाले छप्पर में चली जाती थी और काफी देर बाद निकल कर आती थी।
मैं कभी अम्मी से पूछता कि आप वहाँ क्या करने गई थी तो वो कहती- कुछ नहीं बेटा, तेरे चाचा बैलों के लिये तूड़ी लेकर खेत में जा रहे हैं उन्हें तूड़ी बंधवाने गई थी।
लेकिन धीरे धीरे मुझे उन पर कुछ शक हो रहा था कि आखिर चाचाजान और मेरी अम्मी एक साथ करते क्या हैं।एक दिन मुझे कुछ देखने का हल्का सा मौका मिला। चाचा उन दिनों भैंसों के बाड़े में सोते थे, जब मैं एक रात को चुपके से अपने घर की छत पर जाकर अम्मी का इंतजार करने लगा कि कब अम्मी चाचा के पास जाती है। बाहर ठण्ड भी थी, फिर भी मैं वहीं पर जमा रहा कि कब ये लोग अपना खेल शुरु करते हैं।
और मेरी मेहनत रंग लाई, रात के करीब 10 बज रहे थे, अम्मी ने घर का दरवाजा खोला और उसे धीरे से बंद करके चाचा जहाँ सो रहे थे उस बाड़े में चली गई।
अंदर काफी अंधेरा था और बाहर दरवाजे पर एक फूस का बना टाटा लगा था इस वजह से मुझे अंदर कुछ भी नहीं दिख रहा था। मैं चुपके से छप्पर के पीछे के आले जहाँ गोबर के बने कण्डे से उन्हें बंद किया गया था ताकि अंदर सर्दी ना जाए, उनके पास गया तो केवल अंदर की खुसर फुसर की आवाज सुन रहा था। कभी चाचा तो कभी अम्मी की हल्की-हल्की सिसकारी निकल रही थी
मैं किसी भी तरह अन्दर का नजारा देखना चाहता था लेकिन मुझे आज वो नसीब नहीं हुआ।लेकिन एक बात तो मेर दिमाग में घर कर बई कि चाचा अम्मी कुछ ऐसा वैसा करतें जरूर हैं। बस मेरे दिमाग में हमेशा उनका ही ख्याल रहने लगा।
आगे की कहानी बताने से पहले मैं आपको अपने बारे में बता देता हूँ कि मेरे परिवर में चाचा, अम्मी-अब्बू, मैं एवं मेरी दादी हैं। अब्बाजान शहर में काम करते हैं।
गांव में खेतीबाड़ी का काम है जो चाचा और अम्मी संभालते हैं। तब अब्बू-अम्मी की शादी हुए करीब 13 साल हुए थे जिनके मैं इककौती औलाद हूँ। उन दिनों मैं कक्षा 6 में पढ़ने पास के ही एक गाँव में जाता था। चाचा की उम्र करीब 32 साल हो चुकी थी लेकिन शादी तब तक नहीं हुई थी।अम्मी दसवीं तक पढ़ी हैं, चाचा एकदम अनपढ़ गंवार आदमी है। अम्मी गौरी पतली है, पतली कमर, गोरे-गोरे गाल, गोरा रंग ! चाचा उल्टे तवे जैसे काले रंग के, चौड़ी छाती उस पर काले-काले घुंघराले बाल। दादी अक्सर घर पर ही रहती थी।
उस दिन के बाद तो मेरा मन पढ़ाई में बिल्कुल भी नहीं लगता था, मन करता था कि हमेशा अम्मी के साथ ही रहूँ। मैं किसी भी तरह उनका खेल देखना चाहता था और हर संम्भव प्रयास कर रहा था कि उनका खेल देखूँ।
आखिर मैंने एक दिन स्कूल ना जाकर उनका खेल देखने का फ़ैसला किया क्योंकि मैं जानता था कि अम्मी-चाचा का खाना लेकर खेत पर जाती हैं, अब तो सरसों भी बड़ी हो रही है इसलिये ये दोनों पक्का वहाँ कुछ करते होंगे, यही सोच कर मैं स्कूल ना जाकर चुपके से खेत पर पहुँच गया जहाँ सरसों के खेत के बीच एक बड़ा भारी पेड़ है, उसके नीचे काफी दूर तक सरसों नहीं थी। मैं उस पर चढ़ कर बैठ गया।
लेकिन मेरे काफी इंतजार के बाद भी उन्होंने कुछ नहीं किया और अम्मी घर वापस आ गई। मैं आज फिर निराश ही लौटने वाला था। इस तरह तीन-चार दिन बीत गये और उन्होने कुछ भी नहीं किया। मैं सोच रहा था कि यह शायद मेरी गलत फहमी है।
करीब चार दिन बाद मैंने चाचा को अम्मी से कुछ कहते देखा, अम्मी कह रही थी- ठीक है, आज रात को मैं खेत पर ही आ रही हूँ।
मेरे दिमाग में फिर से कीड़ा कुलबुलाने लगा।
शाम को अम्मी ने खाना बनाकर हमें खिलाया और दादी से कहने लगी- सासूजी, आज रात को देवर जी का खाना खेत पर ही जायेगा क्योंकि रात को बिजली का नम्बर है।
दादी बोली- ठीक है बहू, मलाज को मेरे पास ही छोड़ जाना, बच्चा इतनी दूर क्या करेगा।
अम्मी चाचा का खाना लेकर खेत पर चली गई, इधर मैं भी वहाँ जाना चाहता था लेकिन दादी मुझे अकेले वहाँ नहीं भेजती तो मैंने एक बहाना बनाया और कहा- अम्मा, हमारे पेपर आने वाले हैं आप कहो तो मैं मेरे दोस्त के यहाँ पढ़ने चला जाऊँ?
पहले तो दादी नहीं मानी लेकिन काफी मनुहार करने के बाद उन्होंने जाने की अनुमति दे दी। मैं जल्दी-जल्दी अपने खेत की ओर चल दिया जो गांव से काफी दूरी पर थे।
मुझे रास्ते में डर भी लग रहा था पर मैं किसी धुन में उधर खिंचा चला जा रहा था। बाहर काफी अंधेरा व सर्दी थी। मैं जैसे तैसे करके हमारे ट्यूबवैल के पास पहुँच गया तो सोचने लगा कि शायद अम्मी चाचा खेत में पानी मोड़ रहे होंगे। मैं जैसे ही टयूबवैल के पास पहुँचा तो देखा कि मोटर तो बंद है और कोठरी भी बंद है, कोठरी में अन्दर बल्ब जल रहा है। मैं धीरे-धीरे कोठरी के पास पहुँचा तो लगा कि अम्मी चाचा अंदर ही हैं।
मैं अंदर देखना चाहता था कि वे दोनो क्या कर रहे हैं। यही सोच कर मैं टयूबवैल की तरफ एक छोटी सी खिड़की जहाँ से मोटर को देखते थे, उसके पास जाकर अन्दर देखा तो मेरा शक यकीन में बदल गया। चाचा और अम्मी तख्त पर आपस में एक दूसरे से लिपटे पड़े हैं। कोठरी ज्यादा बड़ी नहीं थी, केवल 8X8 फीट की ही थी, उसमें एक छोटा तख्त डाल रखा था जिस पर चाचा अम्मी लिपटे पड़े थे। चाचा अम्मी के गालों पर अपना मुंह टिका कर चूम रहे थे। अम्मी ने भी चाचा को कसके जकड़ रखा था।
यह सब देख कर एक बार तो दिल में आया कि इन दोनों को मार डालूँ लेकिन मैं तो यह सब कई दिनों से देखना चाहता था और आज वह मौका मिल ही गया। दोनों काफी देर तक इसी