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मैं प्रगति की योनि हूँ ! प्रगति एक 26 साल की मध्यम-वर्गीय, कार्यरत महिला है जिसकी शादी को 15 साल हो चुके हैऔर उसके एक बेटा है जो अब 12 साल का है। उसके पति सरकारी कर्मचारी हैं और उनकी उम्र 40 साल है। मैं प्रगति का सबसे छुपा हुआ अंग हूँ... मुझे बहुत कम लोगों ने देखा है... प्रकृति ने मुझे ऐसी जगह स्थित किया है कि किसी भी के लिए मुझे ठीक से देखना लगभग नामुमकिन है... और यह सही भी है क्योंकि मैं प्रगति का सबसे अनमोल अंग हूँ और मुझे प्रगति की 'इज्ज़त' समझा जाता है।इस लेख से सम्बन्धित चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें !
बाकी लोगों की बात छोड़ो, मुझे तो प्रगति ने भी ठीक से नहीं देखा है ! जब प्रगति छोटी थी तब उसे मुझमें कोई दिलचस्पी ही नहीं थी... बस प्रगति की माँ उसे नहलाते समय मुझमें पानी डालकर अपनी उँगलियों से मुझे साफ़ कर देती थी ! मुझे बहुत अच्छा लगता था। मुझे तभी से अपने ऊपर पानी की बौछार और उँगलियों का स्पर्श अच्छा लगता चला आ रहा है।
जब प्रगति थोड़ी बड़ी हुई तो कभी-कभार अपनी उँगलियों से मुझे छूने लगी थी पर उसने कभी मुझे देखने की कोशिश नहीं की। शायद उसको मुझे देखना मुश्किल भी था क्योंकि बचपन में प्रगति थोड़ी मोटी थी तो अपने पेट के ऊपर से मुझे देख नहीं सकती थी... और बाद में, जब प्रगति ने जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा, तो मैंने अपने आप को रेशमी बालों के घूँघट में छुपा लिया था... जिससे मेरे दर्शन उसके लिए और भी दूभर हो गए थे।
मुझे तो लगता है मुझे प्रगति से ज्यादा तो उसके पति और प्रगति के डॉक्टर ने देखा होगा। प्रगति इस मामले में अकेली नहीं है... बहुत सी लड़कियाँ और महिलाएँ अपनी योनि को ठीक से नहीं देखतीं या यूं कहिये कि देख नहीं पातीं।
चलो मैं अपने बारे में खुद ही तुम्हें बता दूं क्योंकि प्रगति को मेरे बारे में तो कोई खास जानकारी है नहीं।
मेरी बनावट :
मेरे परिवार में बहुत सारे विस्मयी अंग हैं जो नीचे के चित्र में दिखाए गए हैं :

स्त्री यौनांगों का बाहरी रूप
मैं एक 3.5 से 4 इंच लंबी और करीब 3 इंच परिधि की एक पिचकी हुई ट्यूब-नुमा नाली हूँ जिसका एक सिरा प्रगति की जाँघों के बीच खुलता है और दूसरा सिरा प्रगति के गर्भाशय से जुड़ा हुआ है। यह अंदर वाला सिरा लगभग बंद है और सिर्फ बहुत सूक्ष्म तत्व या पदार्थ ही इसके पार गर्भाशय में जा सकता है। मेरे आकार को तुम एक पिचके हुए कंडोम की तरह समझ सकते हो। मेरे अंदर की दीवारें लचीली होती हैं जिससे प्रगति की यौन उत्तेजना के समय मेरा आकार बढ़कर 5 से 6 इंच का हो जाता है। मेरी दीवारों में ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं जो प्रगति की उत्तेजना के समय तरल द्रव्यों का प्रवाह करती हैं जिनसे मैं अंदर से नम या गीली हो जाती हूँ। ऐसा होने से मेरे अंदर पुरुष के लिंग का प्रवेश आसान हो जाता है और मुझे तकलीफ नहीं होती।
मेरे द्वार से लेकर करीब डेढ़ इंच अंदर तक मेरी दीवारों में अनेक तंत्रिकाएँ होती हैं जिनसे प्रगति को स्पर्श, घर्षण, दर्द या सुख की अनुभूति होती है। मेरे बाकी के अंदर के इलाके में ये तंत्रिकाएं नहीं होतीं हैं... अतः प्रगति को शुरू के डेढ़ इंच बाद अंदर कुछ महसूस नहीं होता। यह बात प्रगति के पति को पता नहीं है... वह फालतू में अपने 5 इंच के उत्तेजित लिंग को छोटा समझता है। सच में, मुझे तो केवल दो-तीन इंच का लिंग भी आनंद देने के लिए पर्याप्त है। सच पूछो तो 5-6 इंच से ज्यादा लंबे लिंग तो मेरे उत्तेजित आकार से बड़े होते हैं... सो मुझे तकलीफ दे सकते हैं और प्रगति के गर्भाशय को चोट भी पहुंचा सकते हैं। लम्बाई से ज्यादा तो मुझे मोटे और कड़क लिंग ज्यादा पसंद हैं जो मेरी तंत्रिकाओं को प्रबलता से रगड़ पाते हैं और प्रगति को असीम आनंद देते हैं।इस लेख से सम्बन्धित चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें !
जब प्रगति पैदा हुई थी तो मेरा आकार करीब डेढ़ इंच लंबा था और मेरा मुंह काफी छोटा था। करीब पांच साल की उम्र तक मेरा आकार लगभग उतना ही रहा। उन दिनों जब प्रगति नंगी खड़ी होती थी तो कोई भी मुझे देख सकता था क्योंकि मैं सीधी और खड़ी दिशा में, लगभग लम्बवत, (vertical) थी ... सबके सामने... मुझे कोई शर्म नहीं थी... पर जबसे प्रगति ने यौवनावस्था में क़दम रखा है तबसे मेरे ठीक ऊपर स्थित शुक्र-टीला (Mound of Venus) धीरे-धीरे पनपने लगा और उसके उभार के कारण मैं नीचे की तरफ होने लगी।
प्रगति के सोलहवें साल के आस-पास तक मैं लगभग ज़मीन के समानांतर दिशा में, लगभग दंडवत (horizontal) हो गयी थी। इसी दौरान जब प्रगति बारह साल की हुई थी तब मेरे होठों के आस-पास बाल आने शुरू हो गए थे.... शुरू में बहुत ही मुलायम, काले रेशम जैसे इक्का-दुक्का बाल आये जो कि मेरे होंठों के इर्द-गिर्द उगे थे... धीरे-धीरे 3-4 साल में ये बाल घने होते चले गए और मेरे होटों को तथा मेरे आस-पास के इलाके को एक तिकोने आकार से ढक दिया। कहने का मतलब यह कि जहाँ प्रगति के बचपन में मैं बड़ी शान से अपने आप को दिखा सकती थी, उसकी जवानी के आते-आते मैं ना केवल उसकी जाँघों के बीच, ज़मीन के समानांतर हो गई, मेरे ऊपर बालों का घूंघट सा भी आ गया। इसके फलस्वरूप औरों की बात तो दूर, खुद प्रगति भी नंगी होकर मुझे ठीक से देख नहीं सकती थी। उसे मेरे दर्शन करने के लिए किसी रोशन इलाके में आगे झुक कर, टांगें खोल कर, बालों का झुरमुट हटा कर एक दर्पण की ज़रूरत होती है। शायद इसीलिए उसने मुझे ठीक से देखा नहीं है।इस लेख से सम्बन्धित चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें !
आओ, मैं तुम्हें अपने अंगों और पड़ोसियों के बारे में बताऊँ...

स्त्री यौनांगों की अंदरूनी बनावट
देखा जाये तो मैं प्रगति के जननांगों का बाहरी प्रारूप हूँ... जननांग मतलब प्रसव अथवा प्रसूति अंग या जन्म देने वाले अंग। मैं प्रगति के गर्भाशय तक मरदाना जीवाणु पहुँचाने का मार्ग हूँ... मेरी भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि प्रकृति ने मेरी सुरक्षा के लिए दो-दो द्वार (double-door) लगाये हुए हैं... बड़े भगोष्ठ और छोटे भगोष्ठ। ये दोनों प्रायः बंद ही रहते है और बाहरी गंदगी और कीटाणुओं से मेरा बचाव करते हैं। इन दोनों होटों के बंद होने के बावजूद भी अंदर मैं पिचकी हुई ही रहती हूँ। मेरा यह पिचका रहना ना केवल बाहर के प्रदूषण से एक अतिरिक्त बचाव है बल्कि यौन संसर्ग के दौरान यह घर्षण पैदा करने का निराला तरीका है।इस लेख से सम्बन्धित चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें !
मेरे दो मुख्य कार्य हैं... प्रजनन तथा यौन-सुख का आदान-प्रदान। मैं यौन सुख देती भी हूँ और लेती भी हूँ। प्रगति समझती है कि उसके मूत्र का निर्गम भी मैं ही करती हूँ पर यह गलत है। मेरे समीप, ऊपरी भाग में और भगनासा के नीचे मूत्राशय का छेद है जहाँ से प्रगति पेशाब करती है।
जहाँ छोटे भगोष्ठ ऊपर को मिलते हैं वहाँ पर प्रगति के शरीर का सबसे संवेदनशील अंग है जिसे भगनासा (clitoris) कहते हैं। यह आकार में लगभग एक मटर के दाने के समान होती है। इस लेख से सम्बन्धित चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें !इसमें करीब 8000 से ज्यादा तंत्रिकाएं केंद्रित होती हैं जिस कारण यह बहुत ही मार्मिक अंग बन जाती है... इतनी तंत्रिकाएं तो पुरुष के लिंग के सुपाड़े में भी नहीं होतीं। यह इतनी मार्मिक होती है कि प्रकृति ने इसे एक घूंघट-नुमा टोपे में छुपाया होता है जिससे यह अप्रत्याशित घर्षण से बच जाये। इसे मैं पुरुष के लिंग के समरूप मानती हूँ... यह भी लिंग की ही तरह उत्तेजना पर उभर जाती है और अपने घूंघट से बाहर आ जाती है... और लिंग के सुपाड़े की ही तरह इसका स्पर्श प्रगति में ज़ोरदार रोमांच पैदा कर देता है। इसको छूने से या हल्के से सहलाने से प्रगति को मज़ा तो बहुत आता है पर इसके ऊपर ज्यादा दबाव या घर्षण प्रगति सह नहीं पाती, खास तौर से चरमोत्कर्ष के तुरंत बाद... इससे उसको पीड़ा भी हो सकती है।
नाम से तो लघु भगोष्ठ (Labia Minora) छोटे होने चाहियें पर अक्सर ये काफी बड़े होते हैं और कई बार ये भगोष्ठ (Labia Majora) के अंदर नहीं समा पाते औ